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Wednesday, 10 February 2016

रूपकुण्ड ट्रैक के बारे में जानकारियां

इस यात्रा के सभी वृतान्तो के लिंक निम्न हैं:- 



रूपकुण्ड ट्रैक की जानकारी

रूपकुण्ड ये नाम बहुत से ट्रैकर को अपनी ओर आकर्षित करता आया है, इस एक ट्रैक पर प्रकृति के कई रंग एक साथ देखने को मिलते हैं, पहाड़ के गाँव में रुकने का अनुभव, घना जंगल, शानदार बुग्याल का साम्राज्य, चौखम्भा, नंदा घूंटी और त्रिशूल पर्वत के शानदार दर्शन और विश्व प्रसिद्द नंदा देवी राज जात यात्रा भी यहीं से होकर गुजरती है उससे जुडे पौराणिक स्थान और कहानियां। और फिर इस कुण्ड में बिखरे पड़े सदियों पुराने नर कंकाल तो हैं ही। इतना सब कुछ जब एक ही ट्रैक पर मिल रहा हो तो सभी का इसकी ओर आकर्षित होना बनता ही है। इसलिए साल दर साल बहुत लोग यहाँ घूमने आते रहे हैं। बेदिनी बुग्याल, आली बुग्याल आदि बहुत से आकर्षण यहाँ हैं जो सभी को अपनी और खींचते रहते हैं। 

Tuesday, 9 February 2016

रूपकुण्ड ट्रैक (अन्तिम भाग) :- भगुवासा से जुनारगली और वापसी


रूपकुंड ट्रेक (अंतिम भाग) :- भागुवासा से जुनारगली और वापसी 


कल रात को सोने से पहले ही सबने तय कर लिया था कि सुबह जितनी जल्दी होगा रूपकुण्ड के लिए निकल पड़ेंगे। सिर्फ हम लोग ही कल से भगुवासा में थे। ढाबे वाले ने भी सुबह जल्दी जाने की ही सलाह दी थी, अक्सर जो भी भगुवासा रुकता है, वो सुबह जल्दी जाकर दिन के भोजन के लिए वापिस भगुवासा आ जाता है, क्योंकि इससे आगे कुछ भी उपलब्धता नहीं है। पांच बजे सभी उठ गए, कल शाम का हट के अन्दर टेण्ट लगाकर सोने का आईडिया अच्छी तरह से काम कर गया, सबसे ठण्डी जगह पर रात बिताने के बावजूद, किसी भी सदस्य ने ठण्ड लगने की शिकायत नहीं की, सभी पछता रहे थे कि बेदिनी में ऐसा क्यों नहीं किया। जल्दी से तैयार हो गए, तैयार क्या होना था, सिर्फ जूते ही तो पहनने थे, पूरे कपड़ों में ही स्लीपिंग बैग में सोये थे। नाश्ता करने का मन तो नहीं था, फिर भी जबरदस्ती खाया, सूप और नूडल्स थे, बस ठूंस ही लिए। टोर्च जलाकर अँधेरे में ही रूपकुण्ड के लिए निकल पड़े।

Saturday, 23 January 2016

रूपकुंड ट्रैक- (भाग 3)- बेदिनी से भगुवासा



चौथा दिन (बेदिनी से भगुवासा) 

 सुबह करीब 6 बजे हट से बाहर निकलने की हिम्मत हुयी, रात को तापमान शून्य से नीचे ही था, स्लीपिंग बैग के अंदर मुझे कभी भी अच्छी नींद नहीं आती। नीचे मैट्रेस भी बिछा रखी थी, और पूरे गर्म कपडे पहन के सोया था, फिर भी रात बस जैसे-तैसे ही कटी। मैं अकेला ही नहीं था, सभी की हालत एक जैसी ही थी, सूर्योदय होने में अभी समय था, ठण्ड से डुगड़ुगी सभी की बज रही थी। पूरे बेदिनी बुग्याल में रात की गिरी ओस के कारण बर्फ की हल्की सी चादर बिछी पड़ी थी, सुमित ने जैसे तैसे करके बाहर में एक छोटा सा चूल्हा बनाकर आग जला ली, थोडा सा मिट्टी का तेल साथ लेकर आये थे तो आग जल भी गयी, नहीं तो लकड़ियों पर भी बर्फ सी जमी हुयी थी, एक छोटा सा भगोना रख के पानी गर्म किया, ठन्डे पानी से मुहँ धुलना तो सोच भी नहीं सकते थे। 




Saturday, 16 January 2016

रूपकुंड ट्रैक-(भाग-२)-वाण से बेदिनी बुग्याल

इस यात्रा वृतान्त को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.

तीसरा दिन - वाण से बेदिनी बुग्याल 



 सुबह सात बजे जब आँख खुली तो कल के तीन बिछड़े साथी भी दिखे। पता नहीं रात को कब पहुंचे, कल उनकी एक बाइक की हेड लाइट थराली के आस पास ख़राब हो गयी, दूसरी बाइक को सीध में चलाकर, उसकी लाइट के सहारे वो यहाँ पहुंचे, अँधेरा हो चुका था इसलिये रास्ते में कोई मेकैनिक भी नहीं मिला, इस कारण लेट हो गए। आज करीब 12 कि.मी. का ट्रैक् करके बेदिनी पहुंचना है। वाण की समुद्र तल से ऊंचाई 2450 मीटर, और बेदिनी लगभग 3500 मीटर, याने 12 कि.मी. में 1000 मीटर ऊपर चढ़ना है, तो चढ़ाई अच्छी खासी मिलने वाली है। आठ बजे तक सभी तैयार हो गए और नीचे वाण गांव के होटल में नाश्ता करने चल पड़े। हमने अपने घोड़े वाले भाई को नीचे गांव में ही मिलने को कहा था, क्योंकि स्लीपिंग बैग, टेण्ट, मैट्रेस सब कार में रखा था। 

Thursday, 14 January 2016

रूपकुंड ट्रैक- (भाग १) - आयोजन और दिल्ली से वाण गाँव

आयोजन और दिल्ली से वाण गाँव

  अप्रैल अंतिम सप्ताह में जब डोडीताल ट्रैक किया था तो एक महीने तक पहाड़ की याद नहीं आयी, ट्रैकिंग का कीड़ा बढ़िया से शांत ही रहा, बस हर पल डोडीताल की खूबसूरती ही मन में घूमती रही, फिर जैसे जैसे दिन बीतने लगे कीड़ा कुलबुलाने लगा तो दिमाग खुद ही दौड़ने लगा कि कहाँ जाऊं कहाँ जाऊं, अभी बारिश का मौसम भी शुरू हो चूका था, अगस्त के आखिरी सप्ताह के बाद ही निकला जा सकता था, अचानक एक दिन ख्याल आया कि क्यों ना जी भर के बुग्याल देखें जाएँ, तभी इस बार बुग्याल देखने की ठान ली, वो भी बारिश के तुरंत बाद जब बुग्यालों की खूबसूरती अपने चरम पर होती है। खोजबीन शुरू की तो काफी जगह नजर गयी, पंवाली बुग्याल, दयारा बुग्याल, बेदिनी बुग्याल, गोरसों बुग्याल आदि। आखिरी जंग हुयी पंवाली बुग्याल और बेदिनी बुग्याल के बीच, इसमें बेदिनी बुग्याल जीत गया, इसका सबसे बड़ा कारण था इसके साथ आली बुग्याल का साथ में होना और रूपकुण्ड का इस ट्रैक से जुड़ा होना, जी हाँ वही रूपकुण्ड जो Mystrey Lake के नाम से जाना जाता है, और यहाँ बिखरे पड़े सदियों पुराने नर कंकालों के लिए विश्व प्रसिद्द है। रूपकुंड के बारे में विकिपीडिया से जानकारी लेने के लिए यहाँ क्लिक करें.