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तुंगनाथ से वापसी
साल के इस समय तुंगनाथ को देखना वाकई में एक अदभुत अनुभव था, मंदिर परिसर पूरी बर्फ की आगोश में समाया होता है, कुछ दुकाने और घर बने हैं, सभी पूरी तरह बर्फ में दबे हुये थे, सिर्फ ऊपरी हिस्सा ही नजर आ रहा था, पूरा क्षेत्र ही सुनसान पड़ा था सिर्फ हम ही थे जो पिछले 2 महीने में यहाँ पहुंचे थे। एक चील ने हमारे ऊपर मंडराना शूरू कर दिया था, उसको भी नीचे जमीन पर काफी समय बाद हलचल दिखी तो सोचा होगा शिकार मिल गया। करीब 30 मिनट तक हमारे ऊपर चारों और मंडराती रही। इस समय तुंगनाथ से आस पास के नज़ारे बहुत ही शानदार दिख रहे थे, ऊपर चंद्रशिला की और देखा तो ऐसा सा लग रहा था जैसे एक सफ़ेद गुम्बद हो। सभी फ़ोटो सेशन में ब्यस्त थे, मैंने मजाक में गोविन्द को कहा कि तू सबसे आगे-आगे चलता आया है, मैं भी ट्राय करता हूँ कि फ़ुटमार्क कैसे बनाते हैं ? थोडा सा अलग में एक खम्बा पकड़ के पांव डाला तो ये हाल हो गया.......

