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थलीसैण से श्रीनगर, टेहरी और वापसी
थलीसैण से श्रीनगर, टेहरी और वापसी
थलीसैण से जब आगे बढे तो दिन के तीन बज चुके थे। गढ़वाली में इस क्षेत्र को "राठ" के नाम से जाना जाता है। और यहाँ के निवासियों को "राठी"। आजादी के बाद से यह क्षेत्र विकास की दृष्टि से सदैव उपेक्षित ही रहा था, स्कूल, कॉलेज, सड़क, अस्पताल कुछ वर्षों तक इस क्षेत्र में बामुश्किल ही थे। मुझे याद है कि जब मैं श्रीनगर (गढ़वाल) में छात्रावास में पढता था तो मेरा एक सहपाठी इस क्षेत्र से ही था। छुट्टियों में जब हम अपने-अपने घर जाते थे तो लगभग सभी दोस्त सुबह चलकर शाम तक अपने घर पहुँच जाते थे। जबकि इस मित्र को पहुँचने में दो दिन लगते थे। उसको अपने अन्तिम बाजार, जहाँ तक सड़क थी उसके बाद भी 24 किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव पहुँचना होता था। खैर...ये तब की बात थी। अभी इस क्षेत्र में अच्छी-खासी सड़कें बन गई हैं। और जब सड़कें बन गई हैं तो विकास खुद ब खुद हो ही जाता है। घूमने के लिहाज़ से यह क्षेत्र अभी भी अछूता ही है। इसके लिए मुझे यहाँ दुबारा आना ही होगा।


