Monday, 10 July 2017

पंवाली कांठा ट्रैक - भाग 1

पंवाली कांठा ट्रैक

आयोजन व पहला दिन

पिछले माह जब से लैपटॉप चोरी हुआ है, मन में खटास सी आ गयी। आर्थिक नुकसान तो जो हुआ सो हुआ सबसे ज्यादा दुख आज तक की सारी फ़ोटो के चले जाने का हुआ। कैमरे के कार्ड में सिर्फ पंवाली ट्रैक की ही फ़ोटो थी जो सुरक्षित बची रह गयी। इसलिए इसी यात्रा वृतान्त से आगे बढ़ते हैं। हालांकि कुछ मित्रों को निराशा होगी, क्योंकि उनके साथ मैंने यात्राएं की व उस यात्रा को ब्लॉग पर स्थान नहीं दे पा रहा हूँ।

Wednesday, 5 July 2017

कार्तिक स्वामी यात्रा

कार्तिक स्वामी यात्रा

होली एकलौता ऐसा त्योहार है जिससे मैं दूर ही भागता हूँ। कोशिश करता हूँ होली के समय पहाड़ों में किसी न किसी ट्रैक पर रहूँ, क्योंकि दिल्ली में होता हूँ तो घर से बाहर निकलता नहीं हूं, और घर में पड़े रहने से तो बेहतर है कि पहाड़ों पर विचरण ही किया जाए।

Friday, 28 April 2017

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (भाग-6) - कालागढ़ डैम व कोटद्वार की ओर



पांचवा दिन (दिनांक: 13-12-2016)

सुबह चाय सीधे बिस्तर पर ही आ गयी। कहाँ तो कल हम सर छुपाने के लिए जगह ढूंढ रहे थे और अब यहाँ पूरी आवाभगत नसीब हो रही है। जल्दी से उठ कर आगे की यात्रा की तैयारी कर ली। रावत जी ने कल रात को ही बता दिया था कि आजकल डैम पर किसी भी बाहरी व्यक्ति के जाने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। भारतीय सेना के पाकिस्तान में घुस कर सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद से सभी संवेदनशील जगहों की सुरक्षा के चलते ऐसा किया गया है।


Wednesday, 26 April 2017

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (भाग-5) - धुमाकोट से कालागढ़

चौथा दिन (दिनांक: 12-12-2016)



सुबह सूर्योदय पूर्व ही नींद खुल गयी. पहाड़ों पर स्वतः ही यह मेरे साथ होता है अन्यथा दिल्ली में तो जब तक बीबी चार बातें न सुना दे तब तक आँख क्या कान भी नहीं खुलते. आज उत्तराखण्ड के मैदानी शहर कालागढ़ तक पहुंचना तय किया था. कोई जल्दबाजी भी नहीं दिखाई, आराम से तैयार होकर नीचे सड़क पर आ गए. एक-एक चाय पी और बाइक में सामान बाँधने की प्रक्रिया पूर्ण हुई तो होटल मालिक का हिसाब किताब चुकता कर आगे निकल पड़े.

Wednesday, 22 March 2017

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (भाग-4) - गैरसैण से धुमाकोट (नैनीडांडा)


तीसरा दिन (दिनांक: 11-12-2016)


सुबह छह बजे होटल मलिक ने चाय की प्याली के साथ जगा दिया। सुमित को आज श्रीनगर वापिस जाना था तो उसने घर वापसी की तैयारी शुरू कर दी। किसी भी यात्रा पर साथी का बीच से वापिस जाना कुछ देर के लिए दुखी जरूर करता है। लेकिन क्या कर सकते हैं, घर-परिवार की जिम्मेदारियां भी महत्वपूर्ण हैं। सुमित ने अपना बैग तैयार कर हम तीनों से विदा ले ली। आज दिन के लिए तय किया था कुमाऊँ और गढ़वाल की ठीक सीमाओं से होकर जाती हुई सड़क से गुजरकर नैनीडांडा तक पहुंचना। वहां से आगे रामनगर होकर कालागढ़ की ओर निकल जाएंगे। गूगल मैप की मदद ली तो उसने दो रास्ते दिखाए, एक रास्ता रानीखेत होकर रामनगर जाता हुआ दिखाई दिया, और दूसरा मार्ग ठेठ पहाड़ी और थोडा लम्बा था जो ठीक गढ़वाल और कुमाऊँ की सीमा से होकर धुमाकोट/नैनीडांडा जा रहा था।


Thursday, 9 February 2017

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (भाग-3) :- दूधातोली ट्रैक

दूधातोली ट्रैक

 “अगर मुझे एक चन्द्र सिंह "गढ़वाली" और मिल जाता तो भारत कब का आजाद हो जाता” :- महात्मा गाँधी 


बात 23 अप्रैल सन 1930 की है। गढ़वाल रायफल की एक पलटन पेशावर में तैनात थी। पेशावर के किस्साखानी इलाके में आजादी के दीवाने पठानों की एक सभा हो रही थी, गढ़वाल रायफल की पलटन को इस इलाके में जाकर विद्रोह को कुचलने का निर्देश हुआ, इस पलटन की अगुवाई कप्तान रेकेट कर रहे थे। कप्तान रेकेट ने जब इन निहत्थे लोगों पर गोली बरसाने के आदेश दिए तो हवलदार मेजर चन्द्र सिंह भण्डारी ने अपनी पलटन को सीज फायर का आदेश दे दिया तथा निहत्थे लोगों पर गोली बरसाने से इन्कार कर दिया। इसके बाद 72 गढ़वालियों की इस पलटन पर कोर्ट मार्शल का आदेश हुआ जिसमे इनको सजाये मौत की सजा सुना दी गई। बैरिस्टर मुकुन्दीलाल ने इन गढ़वाली सैनिकों का मुकदमा लड़ा और इनकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलवा दिया। इन्ही हवलदार मेजर चन्द्र सिंह भण्डारी की जन्मभूमि क्षेत्र है चान्दपुर गढ़ी।

वीर चन्द्र सिंह "गढ़वाली" का काफी समय तक अंग्रेजो द्वारा गढ़वाल में प्रवेश निषेध था। अपने अन्तिम समय में वे जब अपनी जन्मभूमि में आए तो उनकी इच्छा थी कि उनकी समाधि को किसी ऊंचे और खूबसूरत स्थान पर बनाया जाए, जहाँ देवदार के वृक्ष हों। भारत के इसी वीर गढ़वाली सपूत का समाधि स्थल दूधातोली में है।

Tuesday, 7 February 2017

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (भाग 2) :- आदि बद्री व चांदपुर गढ़ी

उत्तराखण्ड बाइक यात्रा (8 दिसम्बर से 15 दिसम्बर 2016)
2-तीसरा दिन (10-12016)

सुबह छह बजे सभी जग गए। जग क्या गए जगा दिए गए, रात को होटल में कह दिया था कि सुबह चाय मिल जायेगी तो मजा आ जाएगा। होटल मालिक ने हमारी इच्छा का पूरा ख्याल रखा और कमरे में ही चाय भिजवा दी। बाहर मौसम में ठंडक थी। जल्दी से तैयार होकर आज की घुमक्कड़ी के लिए कमर कस ली। होटल में नाश्ता बनाने को कह दिया इतने में हम 3 किलोमीटर पीछे “चांदपुर गढ़ी” घूमकर वापिस आ जाएंगे।