Sunday, 20 August 2017

पंवाली कांठा ट्रैक - भाग 3

मग्गू चट्टी से पंवाली कांठा :-
(दिनांक 14-4-2017)


सुबह आंख खुली तो गजब की शांति चारों ओर बिखरी हुई थी। कमाल है, पूरी रात आंधी की वजह से जान सूखी पड़ी हुई थी, और अब ऐसा लग रहा था जैसे यहां कल एक पत्ता भी न हिला हो। टैण्ट व झोपड़ी से बाहर निकल कर देखा तो सूर्यदेव अपनी रौशनी बिखेरने के लिए बादलों से जंग लड़ रहे थे। हमारा कल शाम का आग सेकने के लिए बनाया अस्थायी छप्पर धराशायी हुआ पड़ा था।

विक्रम व आशीष ने चूल्हा जला लिया था व सुबह के नाश्ते के साथ-साथ दिन के लिए लंच पैक करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। "सर जी लो चाय पियो" कहते ही आशीष ने गर्म स्टील के भरे हुए गिलास में मुझे चाय थमा दी। मग्गू चट्टी से राज खर्क ठीक सामने दिखाई देता है। पगडंडी पर गिरी बर्फ वहीं से चेतावनी दे रही थी कि मेरे ऊपर से गुजरने के लिए तमीज से चलना वरना अच्छे से रपटने के लिए तैयारी करके आना। 

चाय पीकर फ्रेश हुए, नाश्ता किया व आज की ट्रैकिंग की शुरुआत कर दी। अमित भाई व शशि भाई सबसे पहले निकल पड़े। नटवर भाई मेरे साथ-साथ चलेगा, भट्ट जी सभी तैयारी करवा कर बाद में निकलेंगे। आज लगभग 16 किलोमीटर चलना है, जिसमें इस ट्रैक के उच्चतम बिंदु राज खर्क (3800 मीटर) तक ही चढ़ाई है, उसके बाद रास्ता आसान मिलेगा।

शुरू के सौ मीटर चलने के बाद भूस्खलन की वजह से रास्ते का एक हिस्सा ही गायब हो चुका था, घाटीनुमा इस भाग में बर्फ भी पड़ी थी। रास्ते के निशान के ऊपर आराम से चलते हुए इसको पार कर लिया। नटवर भाई की सही मायनों में यह पहली ट्रैकिंग थी, और बर्फ पर चलने का पहला अनुभव भी। लेकिन कहीं से भी नहीं लगा कि वो पहली बार चल रहे हैं। आराम से इस भूस्खलित क्षेत्र को पार कर लिया। 

मग्गू से आगे जिस ओर हम चल रहे थे इधर धूप ना के बराबर ही पड़ती है इसलिए साल के इस मौसम में भी यहां इतनी बर्फ जमी पड़ी थी। ठण्ड की वजह से यह सख्त भी हो चुकी थी। नर्म बर्फ पर चलना तो आसान होता है, थोड़े से पांव बर्फ में धसेंगे ही इससे अधिक कुछ नहीं होता, लेकिन कठोर बर्फ पर बड़ी ही सावधानी से चलना पड़ता है। हम कोशिश कर रहे थे कि जमी बर्फ पर न ही चलें। इसी प्रक्रिया में कई बार रास्ते से थोड़ा हटकर भी चलना पड़ता है।

बर्फ के ट्रैक में धूप के चश्मे पहनने जरुरी होते हैं। मैं भी पहन कर चल रहा था, लेकिन फ़ोटो खींचने के लिए बार-बार उतारने पड़ते या सर पर टांगने पड़ रहे थे। मालूम नहीं कब मेरे चश्मे सर से खिसक कर बर्फ में मेरे पांव से बने गड्ढे में गिरे और उसके ऊपर नटवर भाई के कदम पड़े और उनका राम नाम सत्य हो गया। कुछ आगे जाकर मुझे चश्मों की याद आई तो नटवर भाई को भी वो दिखाई नहीं दिए थे, सौ मीटर तक वापिस आया तो भी मिले नहीं। 

चश्मों को भूलकर आगे बढ़ चले, धूप अच्छी खासी खिली हुई थी। ठीक पीछे केदार पर्वत श्रखंलाओं के शानदार नजारे दिखाई दे रहे थे। कुछ आगे तक आसान रास्ते के बाद सीधी खड़ी चढ़ाई दिखाई दे रही थी। आराम आराम से चढ़ाई को कदमों से नापते रहे, दूर पीछे से मग्गू की ओर से भट्ट जी भी आते दिखाई दिए। मुख्य रास्ते पर बर्फ पड़ी थी इसलिए नाक की सीध में चढ़कर इस चढ़ाई से पार पाने की ठान ली। पंद्रह मिनट के जबरदस्त संघर्ष के बाद ऊपर धार पर जा पहुंचे।

यहां धार से दूर मग्गू चट्टी साफ दिखाई पड़ रहा था, ठीक सामने पूरी हिमालयी पर्वत श्रखंलाओं के शानदार नजारे आंखों के सामने थे व ठीक पीछे राज खर्क की अंतिम चढ़ाई। इस चढ़ाई को पार करने से पहले कुछ देर आराम कर लिया जाए व हिमालयी नजारे सामने हों तो कैमरा खुद ब खुद बाहर निकल ही आता है। जमकर फ़ोटो सेशन किया गया, मग्गू की ओर से हमारे बचे साथी विक्रम व आशीष भी आते दिखे तो हम भी आगे बढ़ लिए। 

कल हमारा यहीं धार के आस-पास तक पहुंचना तय किया था, लेकिन मौसम व यहां के हालात देख कर हमारा मग्गू में रुकने का निर्णय बिल्कुल सही साबित हुआ। तेज हवा में यहां टैण्ट लगाना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होता, व पानी की उपलब्धता भी मग्गू के बाद सिर्फ यहीं पर है, इसके बाद सीधे पंवाली जाकर ही पानी मिलना था। 

सामने राज खर्क के लिए ज़िग जैग करता हुआ ऊपर की ओर रास्ता दिख रहा था, अनुमान था कि आज के दिन के लिए यह अन्तिम चढ़ाई वाला भाग है। इसके बाद पंवाली तक कहीं भी चढ़ाई नहीं मिलेगी। चूंकि राज खर्क 3800 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि पंवाली 3350 मीटर की, इसलिए यहां से ढलान युक्त रास्ता ही आगे मिलने वाला है। आराम से चढ़ते हुए राज खर्क पहुंच गए। यहां से पंवाली की ओर रास्ते पर बर्फ की वजह से शानदार नजारा देखने को मिल रहा था।

राज खर्क से दो किलोमीटर दूर तक पहाड़ी की धार से होकर गुजरना होता है। पहाड़ी के इस ओर बर्फ के बीच से जाती पगडंडी का अदभुत नजारा यहां से दिख रहा था। हमारे दाहिनी ओर टेहरी जिले का आखिरी गांव "गंगी" भी यहां से दिखाई देता है। हमने चमोली जिले से इस ट्रैक की शुरूआत की थी व अब टेहरी जिले में पहुंच चुके थे। ठीक पहाड़ के तल पर भिलंगना बह रही है, हम पहाड़ की चोटी के साथ साथ चलकर घुत्तू में भिलंगना से मिलेंगे। 

भिलंगना घाटी में बसे गंगी गांव का भी इस क्षेत्र में विशेष महत्व है। यह गांव आजादी के 70 सालों बाद भी आधुनिक सुख सुविधाओं से दूर है। लेकिन व्यापार और व्यापारी इस गांव के निवासियों की पहचान है। सन 2013 में आई केदार आपदा में जब केदारघाटी बर्बाद हो चुकी थी तो वहां के व्यापारियों को गंगी निवासियों ने आर्थिक सहायता की थी। केदार घाटी को व्यापारिक दृष्टिकोण से फिर से खड़ा करने में गंगी गांव का विशेष हाथ है। इस गांव की एक स्वयं की पैरेलल इकोनॉमी चलती है। किसी को गंगी गांव के निवासियों से उधार लेना है तो स्थानीय देवता के सामने लेन-देन किया जाता है। उधार चुकाने वाले ने अगर समय पर पैसे नहीं लौटाए तो स्थानीय देवता के कोप का भागी बनना पड़ता है। इसी मान्यता के साथ बिना लिखा-पढ़ी के यहां आपसी लेन देन आज भी होता है। सुनने में यह भी आया है कि नोटबन्दी के समय यहां के निवासी बोरों में नोट भरकर बैंक में पहुंच गए थे। 

कुछ देर तक यहां पर फ़ोटो सेसन करने के बाद आगे बढ़ चले, एक किलोमीटर दूर बाकी साथी हमारी प्रतीक्षा करते दिख रहे थे। बुग्याल क्षेत्र शुरू हो चुका था इसलिए जमी बर्फ पर सावधानी से चलना पड़ रहा था। अगर पैर फिसला तो सीधे खाई में आधे किलोमीटर तक लुढ़कते हुए पहुंच जाएंगे। यहां कोई झाड़ी भी नहीं होती जिस पर अटक जाएंगे या कुछ लुढ़कते हुए हाथ में ही आ जायेगा। अत्यंत सावधानी से पार पाना होता है। आराम से चलते हुए बाकी साथियों के पास पहुंचे तो विक्रम व आशीष ने दिन के भोजन के लिए पैक कर लाई सब्जी, रोटी व सूजी का हलवा परोस दिया। गर्मागर्म चाय भी मिल गयी। 

भूख भी जोरों से लग रही थी, जमकर खाना खा लिया गया। भोजन करने के उपरान्त कुछ देर यहीं पर पसर गया। बाकी साथी फिर से आगे निकल गए। चूंकि पंवाली ट्रैक सावन के महीने में गंगोत्री से गंगाजल लेकर चलने वाले कांवड़ियों का मुख्य मार्ग है इसलिए रास्ता भटकने का कोई खतरा नहीं है। पूरा मार्ग स्पष्ट बना है इसलिए मुझे कोई चिन्ता नहीं थी। आराम से पहुंच जाऊंगा। नटवर भाई भी साथ-साथ ही चलते रहे। 

यहां से काफी दूर पंवाली की झलक मिलने भी लगती है, अनुमान लग जाता है कि वहीं कहीं पहुंचना है। रास्ता अधिकतर उतराई का ही है, बस आखिरी में कहीं थोड़ा बहुत चढ़ना पड़ेगा। 

यहां से कुछ उतराई के बाद करीब एक किलोमीटर तक और पहाड़ी की धार से होकर गुजरना था। बुग्यालों की पहाड़ी की धार पर चलने का भी एक अलग ही आनन्द है। सुबह से 12 किलोमीटर के लगभग चल चुके थे, थोड़ी सी थकान का  होना भी लाजिमी था ही। पांव के नीचे तलुओं में ऐसा लगने लगा कि आग सी लग गयी है। वाटरप्रूफ जूतों के साथ यही एक परेशानी है। इनमें हवा के लिए वेंटिलेशन इतना नहीं होता जैसे सामान्य जूतों में होता है। चूंकि बर्फ के क्षेत्र से अब बाहर आ चुके थे व आगे कहीं बर्फ नहीं मिलेगी तो जूते उतारकर बैग के दोनों ओर लटका लिए व चप्पल पहन कर ट्रेकिंग शुरू कर दी।

कुछ देर आराम करने के पश्चात आगे बढ़ चले। सामने मट्टा बुग्याल दिख रहा था। यहां पर एक रास्ता बायीं ओर जाता है जो मट्टा बुग्याल के लिए निकलता है। छोटा सा घना बांज-बुरांश का जंगल बीच में पड़ता है। यहां पर घने जंगल मे लगातार शार्ट कट मारने शुरू कर दिए। काफी नीचे रास्ता दिखाई दे रहा था कौन लंबे चक्कर काटे। काफी नीचे तक उतराई दिखाई दे रही थी, यहां भी शार्ट कट मार दिए। सामने पंवाली भी नजर आ रहा था व पंवाली के शुरू में ही बनी कुछ झोपड़ीनुमा घर भी। 

शाम का समय भी हो चला था, जंगल पार करते ही पंवाली बुग्याल में प्रवेश कर लिया। शुरुआत में ही कुछ झोपड़ियां बनी हैं, हमारे साथी भी यहीं कहीं होंगे, कुछ आगे आग का धुंआ दिखाई दिया तो समझ आ गया कि आज रात के ठिकाने पर पहुंच चुके। जब सभी के पास पहुंचे तो देखा कि विक्रम एक झोपड़ी के आंगन में खुले में खाना बनाने की तैयारी कर रहा है। भट्ट जी से पूछा कि इतनी झोपड़ियां हैं, किसी भी एक पर कब्जा कर लो, रात को बुग्यालों में तापमान अचानक से बहुत कम हो जाता है। जब हमको छत मिल रही है तो क्यों ठंड में मरना। 

एक झोपड़ी को खोलकर उसके अंदर सफाई की गई व वहीं एक कोने में बना बनाया किचन भी मिल गया। दूसरे कोने पर झोपड़ी के अंदर ही मैंने अपना टैण्ट लगा दिया। अमित भाई व शशि भाई ने बाहर खुले में टैण्ट में सोने का फैसला किया। कुछ ही देर में विक्रम ने चिप्स तल कर गर्मागर्म चाय के साथ पकड़ा दी। आज बहुप्रतीक्षित पंवाली में आखिर पहुंच ही गया। न जाने कब से यह बुग्याल क्षेत्र मेरी हिट लिस्ट में था। 

रात को सोने की व्यवस्था कर बाहर टहलने लगे, आज हमारे 20 किलोमीटर आगे-पीछे तक सिर्फ हम ही हम थे। ऐसे में यहां के राजा आज हम ही थे, अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए कल निकलेंगे, आज 16 किलोमीटर चल कर यहां पहुंचे हैं थोड़ा आराम कर लेते हैं।


मग्गू से आगे

रास्ता कुछ यूँ

नटवर भार्गव

रास्ता

केदारनाथ की ओर

राज खर्क की ओर

मग्गू चट्टी व भट्ट जी आते हुए

रविन्द्र भट्ट व नटवर भार्गव

आगे का रास्ता



पंवाली की ओर

















दूर दिखाई देता पंवाली

पंवाली बुग्याल प्रवेश

झोपड़ी मतलब रात बिताने का ठिकाना


10 comments:

  1. बुग्याल की सुन्दरता देखनी हो तो अगस्त व सितंबर में जाओ, बाकी दिनों में फीका फीका सा ही लगता है,

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  2. शानदार सफ़र रहा आपका, बहुत ही सुन्दर फोटोग्राफी

    आगामी यात्रा का इंतज़ार रहेगा

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  3. बेहतरीन यात्रा और उस से भी सुंदर आपका लिखा वृतांत

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    1. धन्यवाद पालीवाल जी

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  4. वाह! मजा गई भेजी। आपकु यात्रा वृतांत एक दम नयनाभिराम, जन बुलेंदु की मीन भी यखी छा। .. दीपक नैथानी

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  5. बेहद सुंदर नजारे है । साथ में रोमांचित करने वाला यह लेख। शानदार

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  6. सुंदर यात्रा को अक्षरशः पटल पर उतार दिया ,ऐसा लगा हम भी साथ ही हों आपके, किन्तु हमारा ऐसा भाग्य कहाँ, भिलंगना घाटी का होते हुए भी अभी पंवाली न जासके ,

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