Thursday, 30 June 2016

सतोपन्थ ट्रैक (भाग ३) - जोशीमठ से वसुधारा

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सतोपन्थ यात्रा (भाग ३) - जोशीमठ से वसुधारा


रात को सोने से पूर्व बाकी साथियों से बात हुई थी तो उनको कहा था कि सुबह दस बजे तक बद्रीनाथ पहुँच जाऊंगा। पिछले ३६ घण्टे से सोया ना होना और सफ़र की थकावट की वजह से सुबह आठ बजे आँख खुली। सुमित को उठाया तो उठ नहीं रहा था। फिर प्रवचन दिया कि तू क्या यहाँ सोने आ रखा है ? सुबह-सुबह के मेरे प्रवचनों से बचने का उसके पास जो सबसे अच्छा उपाय वो अपना सकता था, वही उसने अपनाया। बड़बड़ाते हुए उठ कर बाथरूम में घुस गया।

उधर बद्रीनाथ से भी फोन आया कि कब तक आओगे, हम चरण पादुका की ओर जा रहे हैं। उनको कह दिया कि तुम लोग होकर आ जाओ हम दोनों आराम से ही आएंगे। नौ बजे तक तैयार होकर होटल छोड़ दिया। नाश्ते की बाबत सुमित ने पुछा तो मैंने कह दिया कि आगे रास्ते में कहीं करेंगे, अभी जोशीमठ से निकलते हैं। वैसे तो जोशीमठ में भी घूमने लायक जगहैं हैं। यहाँ का प्रसिद्द शंकराचार्य का मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, और इनसे जुडी पौराणिक मान्यताएं बहुत प्रसिद्द हैं। इन सब जगहों का भविष्य में तसल्ली से भ्रमण करूँगा, कैमरा भी साथ में नहीं था यही सोचकर आगे निकल पड़े। 

जोशीमठ से विष्णुप्रयाग तक सीधी उतराई है, बीस मिनट में नीचे पहुँच गए। यहाँ विष्णुप्रयाग पर अलकनन्दा का वेग देखते ही बनता है। विष्णुप्रयाग से कुछ आगे गोविंदघाट में रुककर नाश्ते का आर्डर दे दिया। हेमकुंड साहिब यात्रा बड़े जोर शोरों से चलती दिखायी दी। सिख श्रद्धालु "जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल" के उदघोष के साथ यात्रा शुरू कर रहे थे।

गोविंदघाट से नाश्ता करके निकले ही थे कि मौसम ख़राब होने लगा। लामबगड़ के हाल देखकर समझ आ जाता है कि क्यों आए दिन बद्रीनाथ मार्ग भू-स्खलन की वजह से बन्द पड़ा रहता है। यहाँ पर देखकर ऐसे लगता है कि ये पहाड़ नीचे गिरने के लिए ही बना है, और हरदम गिरने के लिए तैयार भी रहता है। बस इसको बहाना चाहिए। यहाँ पर भू-स्खलन करवाने के लिए सिर्फ १० मिनट की बारिश काफी है।

लामबगड़ को पार कर रहे थे तो अपने कल रात के जोशीमठ रुकने के फैसले पर बड़ा गर्व हुआ। यहीं कुछ आगे चलकर जयपी ग्रुप का ४५० मेगावाट का छोठा हाइड्रो प्रोजेक्ट है। १०० मीटर में ही अलकनन्दा को रोककर छोड़ दिया गया है। मैं पहाड़ों पर ऐसे ही छोठे-छोठे प्रोजेक्ट का समर्थक हूँ। यही से बद्रीनाथ के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है। २०० मीटर ही आगे बढे होन्गे कि पीछे से एक फौजी जीप ने लगातार हॉर्न देना शुरू कर दिया। मैंने सुमित को कहा कि वो कुछ इशारा कर रहे हैं। बाइक धीमी कर उनको पास आने दिया तो उन्होंने इशारा किया कि तुम्हारा कुछ सामान पीछे गिर गया है। बाइक के फुट रेस्ट पर हमने मैट्रेस और टेण्ट बाँधा हुआ था। देखा तो टेण्ट महाशय नदारत मिले। 

सुमित ने मुझे वहीँ बाकी सामान के साथ उतारकर फ़ौरन बाइक मोड़ी और टेण्ट की ढून्ढ में वापिस चला गया। उसके जाते ही एक यात्रियों की गाडी मेरे पास से गुजरते हुए रुकी, उन्होंने इशारा कर मुझे पास बुलाकर पुछा कि क्यों रुके हो ? मैंने बताया कि हमारा कुछ सामान पीछे गिर गया है। उन्होंने अपनी गाडी से टेण्ट निकालकर मुझे देकर आगे बढ़ गए। सुमित को फोन लगाकर वापिस बुलाने के लिए फोन निकाला तो मोबाइल में सिग्नल ही नहीं। अब क्या किया जा सकता था। सड़क किनारे बैठकर इन्तज़ारी करने के सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं था।

आधे घण्टे बाद चेहरे पर निराशा का भाव लिए सुमित वापिस लौटा। उसको टेण्ट दिखाया तो चेहरे पर चमक लौट आई। यहाँ से आगे बढे ही थे कि सुमित के कुछ मित्र बद्रीनाथ से बाइक पर लौटते हुए मिल गए। इनमें एक मित्र मुझे भी पहचानते थे पंकज शर्मा गौतम। रूपकुण्ड ट्रैक में पंकज मेरा सहयात्री था। सभी से कुछ देर बातचीत के पश्चात विदा लेकर आगे बढ़ गए। चढ़ाई लगातार जारी रहती है, जो बद्रीनाथ पहुँचकर ही समाप्त होती है। जय बद्री विशाल के जयकारे के साथ बद्रीनाथ में प्रवेश किया। 

बद्रीनाथ पहुँचकर बाकी साथियों को फोन लगाया तो सुशील कैलाशी भाई का फोन लग गया। उनसे होटल के बारे में पुछा तो मालूम पड़ा सभी बरेली वालों की धर्मशाला में रुके है। देखा तो हम उसी के पास में खड़े थे। धर्मशाला के अन्दर जाकर संचालक महोदय से मुलाकात की, और कुछ देर उन्ही के कमरे में बैठ कर बातें करने लगे। यहीं पर हमारा गाइड गज्जू भाई भी आ पहुँचा। गज्जू भाई को कल के लिए तैयारी करनी थी तो इसको साथ चलने के लिए पाँच पोर्टर की और व्यवस्था करने को कह दिया। अपने साथियों की स्थिति जानने के लिए फोन किया तो मालूम पड़ा कि उनको अभी आने में तीन घण्टे लग जाएंगे। 

यहीं पर गज्जू ने मुझे बताया कि इस वर्ष कम बर्फ़बारी के कारण सतोपन्थ ट्रैक वसुधारा की और से न होकर बद्रीनाथ से ही दूसरी और जाकर आगे जाना पड़ रहा है। पहले वसुधारा से कुछ आगे अलकनन्दा ग्लेशियर पार करके लक्ष्मीवन पहुँच जाते थे। चूँकि इस वर्ष ग्लेशियर फट गया है इसलिए उसको पार करना असम्भव है। यहाँ धर्मशाला में तीन घण्टा बैठ कर क्या करना चलो माणा ही घूम आते हैं। यह सोचकर सुमित और मैं माणा के लिए निकल पड़े।

बद्रीनाथ से माणा की दूरी तीन किलोमीटर है। यह गाँव भारत के अन्तिम गाँव की वजह से काफी प्रसिद्द है। ऐसे तो भारत की सीमा कई देशों से लगी है। लेकिन बद्रीनाथ में लाखों की संख्या में यात्री आते हैं तो माणा तक भी जरूर जाते हैं। इसलिए यह गाँव सभी की जुबान पर चढ़ गया है। माणा तक सड़क भी बन गयी है। बल्कि इससे २५ किलोमीटर आगे माणा पास तक भी सड़क बन चुकी है। चूँकि ये सीमावर्ती क्षेत्र है इसलिए माणा पास सिर्फ फौजी गाड़ियाँ ही जा सकती हैं। 

पंद्रह मिनट में हम भी माणा पहुँच गए। यहाँ बड़ी चहल पहल मिली, जितने भी श्रद्धालु बद्रीनाथ आज विश्राम कर रहे हैं ऐसा लगा सभी यहाँ आ पहुंचे हैं। घर-घर में यहाँ भेड़ की बनी ऊन के कपडे शॉल आदि की दुकानें खुल चुकी हैं। यहीं माणा में गणेश गुफा, और व्यास गुफा स्थित है। गणेश गुफा के लिए कोई सौ मीटर की हल्की सी चढ़ाई चढ़नी होती है, कई श्रद्धालुओं को इसी में हाँफते देखकर सुकून मिला। 

पुराणों के अनुसार महाभारत की रचना वेद व्यास जी ने यहीं की थी और गणेश जी ने इसी गुफा में बैठकर महाभारत को लिखा था। गणेश गुफा के बाद व्यास गुफा को देखा। गुफा के अन्दर वेद व्यास जी की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। व्यास पोथी चट्टान को ध्यान से देखकर लगता है कि इस चट्टान पर बहुत कुछ लिखा हुआ है। 

दोनों गुफा को देखने के बाद सरस्वती नदी के उदगम् स्थल और भीम पुल के लिए चल पड़े। सरस्वती के वेग का शोर यहाँ ऊपर तक साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रहा था। पहाड़ के गर्भ से प्रचंड वेग से निकलती सरस्वती नदी को देखना अचम्भित कर देता है। इस वेग को देखकर कोई भी डर जाए। द्रोपदी भी डरी तो आश्चर्य नहीं हुआ। भीम ने इसको पार करने के लिए जो शिला रखी वही भीमपुल के नाम से जाना जाता है। हालांकि अब साथ में ही आम जनों के लिए नगर पालिका पुल बन चुका है। कई सेल्फ़ी के लिए मूर्ख कोने कोने में जाकर सरस्वती के वेग के साथ फ़ोटो खींचते दिखे, ऐसे ही कुछ मूर्ख हर साल समाचारों की सुर्खियां भी बनते हैं।

यहीं भीम पुल से पाँच किलोमीटर आगे वसुधारा है। चूँकि कल हमें दूसरी ओर से सतोपन्थ के लिए निकल जाना था, इसलिए सोचा वसुधारा अभी देख आता हूँ। सुमित को चाय की तलब लग रही थी, उसको बोला चल तुझे वसुधारा में चाय पिलवाऊंगा। हालांकि मौसम ख़राब हो रहा था लेकिन घुमक्कडी मन कहाँ मानता है। हम दोनों निकल पड़े वसुधारा की ओर। 

हल्की सी चढ़ाई के साथ रास्ता शुरू होता है जो पाँच किलोमीटर ऊपर वसुधारा तक बना ही रहता है। भीमपुल की भीड़ भाड़ से भी मुक्ति मिली और डेढ़ घण्टे में हम मस्ती में चलते हुए वसुधारा पहुँच गए। रास्ते में काफी श्रद्धालुओं से मुलाकात भी होती रही। इस रास्ते पर चलते हुए करीब दो किलोमीटर पहले से वसुधारा जल प्रपात दिखना शुरू हो जाता है। 

मान्यता है कि इस जल प्रपात का पानी किसी किसी के ऊपर ही गिरता है। यहाँ भी कई मूर्खों से पाला पड़ा जो पूरे कपडों सहित प्रपात में नहा भी आये। उनको समझाया कि पुण्य ही कमाने थे तो कपडे उतार के नहा लेते तब भी कमा सकते थे। इस तापमान में गीले कपडों से हाइपोथर्मिया हो जाएगा। लेकिन पाप पुण्य के सामने ये सब कहाँ टिकता है। 

१२२ मीटर ऊपर से गिरता यह प्रपात हवा के वेग से इधर उधर हिलता रहता है। अगर पापी से पापी मनुष्य भी २ मिनट के लिए इसके पास तक चला जाए तो अवश्य भीग जाएगा। लोग भीग कर खुश हो लेते हैं कि उन्होंने कोई पाप किए ही नहीं। यहीं पर एक बाबा की कुटिया है, वहां बाबा जी से मिलने या यूँ कहें कि चाय पीने चले गए। सुमित को चाय पिलवाने का वादा जो किया था।

क्रमशः....

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नाश्ता







गणेश गुफा



व्यास गुफा


सरस्वती नदी

सरस्वती नदी



वसुधारा



सुमित






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32 comments:

  1. जोगी जी वाह, जोगी जी।

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    1. धन्यवाद ललित सर। :)

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  2. bahut badiya bhai ji pata nahi aap itni yatra kese kar lete ho, Par jab bhi aap ki yatraoo ki kahani padhta hu man apne gaav pahuch jata hai aur bachpan k din yaad aa jate hai

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    1. हिमालय प्रेम सब करवा देता है भाई।

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  3. Bahut achche beenu bhai, maja aa raha hai yaatra vrataant padhkar...

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    1. धन्यवाद प्रदीप भाई

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    1. धन्यवाद रमेश भाई जी

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  5. ase mei maza nahi aa raha ...ek bar mei likh do sara .....ye dil mage more :-)

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    1. महेश जी सब्र का फल मीठा होता है। :)

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  6. बहुत सुंदर यात्रा।

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    1. धन्यवाद सचिन भाई

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  7. बीनू भाई आप के द्वारा हम ने भी वसुधारा के पास से दर्शन कर लिए। इस के बाद तो यात्रा में वसुधारा के दर्शन दूर से ही होंगे।

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    1. जी कैलाशी भाई। धन्यवाद

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    1. धन्यवाद नीरज भाई

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  9. अगर मैं गलत नहीं हूं तो वसुधारा फॉल की ऊंचाई १४८ मीटर है । वैसे सरस्वती नदी के पास नजारे इतने शानदार होते हैं कि हर कोई सेल्फी ले ले रे के चक्कर पड जाता है

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    1. योगी भाई हो सकता है, मैं गलत भी होऊं, लेकिन मेरी जानकारी १२२ मीटर की है। धन्यवाद भाई।

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  10. अगला भाग कब आज 15 दिन हो गये

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    1. कभी कभी ब्यस्तता की वजह से देरी हो जाती है भाई।

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  11. बढ़िया बीनू भाई..... मज़ा आ रहा है ।👍

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    1. धन्यवाद डॉक्टर साहब।

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  12. सरस्वती नदी का वेग देखकर दिल सिहर गया ।और वहां सेल्फ़ी लेना उफ़्फ़्फ़ ...

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    1. जी बुआ। सरस्वती नदी प्रचंड रूप से बहती है।

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  13. बहुत सुन्दर धान्य हो

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  14. Another interesting post. There's much to see and explore around Badrinath. And Saraswati river indeed looks intimidating.

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  15. बिल्कुल,माणा के आस पास भी और चरण पादुका की ओर भी काफी कुछ देखने के लिए है।

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