Saturday, 16 July 2016

सतोपन्थ ट्रैक (भाग ४)- वसुधारा से बद्रीनाथ और तैयारियां

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वसुधारा से बद्रीनाथ और तैयारियां

हम दोनों जब बाबा जी की कुटिया में गए तो वहां पहले से ही तीन चार लोग बाबा जी के साथ बैठे थे। एक दो बुजुर्ग भी थे, शायद गुजरात से आए हुए श्रद्धालु थे। नौजवान बाबा जी सभी को चाय जरूर पिलाते हैं। अगर भूखे होंगे तो भोजन भी करवा देते हैं। बाबा जी की बातों से ही आभास हो रहा था कि पढ़े लिखे इंसान हैं।


हमारे जाते ही गर्मागर्म चाय आ गई। सुमित से उन्होंने परिचय पुछा तो सुमित ने बताया कि वो एन.आई.टी. श्रीनगर में जूनियर इंजीनियर है। बाबा जी उससे पनचक्की के बाबत जानकारी लेने लगे। बाबाजी इससे बिजली पैदा करना चाह रहे हैं, जिससे यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को चाय या भोजन बनाने के लिए बिजली से चलने वाला चूल्हा उपयोग किया जा सके। चूँकि ये ग्लेशियर क्षेत्र है, इसलिए यहाँ जंगल नहीं है। लकड़ी मिलती नहीं है, और मिटटी का तेल लेने बार-बार माणा या बद्रीनाथ जाना पड़ता है।

सुमित ने बाबा जी को पूरी जानकारी दी और अपना फोन नम्बर भी दे दिया। और बाबा जी से कहा कि जब भी आप श्रीनगर आएं, घर पर जरूर आइयेगा। कुछ देर पश्चात बाबा जी से इजाजत ली, कुछ दक्षिणा देनी चाही तो उन्होंने साफ़ इन्कार कर दिया। फिर भी जबरदस्ती उनके चरणों में रखकर हम लौट पड़े। तेजी से नीचे उतरने लगे, मौसम तो ख़राब बना ही हुआ था। करीब सौ मीटर ही नीचे पहुंचे थे कि एक परिवार ऊपर चढ़ता हुआ पस्त हालत में मिला। उन्होंने पूछा कि वसुधारा कितना दूर है। उनको बताया कि आप पहुँच चुके हो बस सौ मीटर दूर दिखायी दे रहे मोड़ के पार ही है। उन्होंने उनसे सौ मीटर और नीचे खड़े दम्पतियों की ओर इशारा करके कहा कि उनकी भी इसी तरह हौसला अफजाई करके उनको भी ऊपर भेज दीजियेगा।

जब हम उन दम्पतियों के पास पहुंचे तो उनको भी बताया कि आप पहुँच चुके हो बस पाँच मिनट में वसुधारा पहुँच जाओगे। पति की हालत पस्त थी जबकि पत्नी ठीक हालत में थी और आगे जाना भी चाहती थी। लेकिन पति नहीं माना और वापिस नीचे की ओर चलने लगा। उनको फिर से समझाया कि आपने ९५% रास्ता तो तय कर लिया आपको वापिस नहीं लौटना चाहिए, आखिरी का सौ मीटर बचा है, हिम्मत कीजिये और जाइये। पत्नी ने भी हमारी हाँ में हाँ मिलायी, फिर भी पति नहीं माना और लौट पड़ा। पत्नी ने वहीँ पर खड़े खड़े बड़बड़ाना शुरू कर दिया। और दोनों दम्पति लड़ने लगे।

उनको लड़ता छोड़ हम आगे बढ़ गए। सुमित भी बोल पड़ा कि तुमने खामखाँ दोनों की लड़ाई करवा दी। कुछ नीचे आकर पीछे मुड़ कर देखा तो तब भी दोनों पति पत्नी झगड़ने में मशगूल थे। तेज कदमों के साथ नीचे की ओर उतरने लगे, करीब आधा किलोमीटर और नीचे पहुँचे कि एक परिवार नीचे उतरते हुए मिल गया। दो सुन्दर कन्याएं, उनकी माता और एक छोठा बच्चा था।

सिर्फ बच्चे को छोड़कर सबकी हालत पस्त थी, खासकर माता जी की। जब सुमित और मैं वसुधारा के लिए चढ़ाई कर रहे थे, तब भी यह परिवार हमें उतरते हुए मिला था। कनिष्ठ कन्या ने हमको देखकर बोला कि प्लीज हमारी भी चलने में मदद कीजिये। अति हर्ष के साथ हम उनकी मदद करने लगे। इस परिवार के साथ धीरे-धीरे नीचे उतरते जा रहे थे। बातचीत भी हो रही थी। ये कन्या पत्रकारिता की पढाई कर रही थी। इसी बीच बद्रीनाथ से अमित तिवारी भाई बार-बार फोन किए जा रहे थे। कल से सतोपन्थ की ट्रैकिंग शुरू करनी थी, अच्छा खासा ग्रुप साथ था। राशन आदि की खरीददारी के लिए मेरी इन्तज़ारी कर रहे थे।

लेकिन इतनी खूबसूरत मदद के सामने कुछ देर अमित भाई के फोन को दरकिनार करना ही सही लगा। इन लोगों से बातचीत करते-करते भीम पुल तक उतर आये। अब लगा कि काफी मदद हो चुकी तो इनसे बुझे मन से विदा ली। जबकि ये कन्या चाहती थी कि हम और मदद करें, लेकिन देरी हो रही थी। इस चक्कर में बाकी साथियों से गालियां पड़ना निश्चित था।

माणा गाँव में भेड़ की ऊन से बने कपडे, शॉल आदि खूब बिकते हैं। चूँकि ये भोटिया जनजाति क्षेत्र है, भेड़पालन और कृषि ही यहाँ आजीविका का साधन हुआ करता था। साल के छह महीने यहाँ सन्नाटा पसरा रहता होगा, अभी तो चार धाम यात्रा की वजह से खूब चहल पहल है। स्थानीय निवासी बाकी छह महीने तक इन वस्त्रों को बुनते रहते हैं, यात्रा समय में घर घर में दुकान सज जाती है, इससे इनकी कुछ आमदनी भी हो जाती है। एक भेड़ की ऊन से बुनी शॉल मैंने भी खरीद ली।

हालाँकि माणा गाँव और बद्रीनाथ में सिर्फ तीन किलोमीटर की दूरी है, लेकिन इस गाँव का पहनावा, रहन-सहन बिल्कुल भिन्न है। यहीं पर हमारी मोटरसाइकिल खड़ी थी, फोन लगातार बजा जा रहा था, इसलिए जल्दी से बद्रीनाथ की ओर निकल पड़े।

बद्रीनाथ पहुँचकर सभी साथियों से मुलाकात की, अमित भाई, संजीव त्यागी और मैं अपने साथ सतोपन्थ जा रहे पोर्टरों के मुखिया गज्जू भाई के साथ राशन व अन्य सामान की खरीददारी करने निकल पड़े। ट्रैक पर जाते समय राशन के मामले में हर छोठे से छोठे सामान का विशेष ध्यान रखना होता है। मसलन अगर नमक भूल गए तो एक सप्ताह तक बिना नमक का भोजन करना पड़ेगा। वैसे अमित भाई ने एक लिस्ट पहले से बना ली थी, जो हमसे भी चेक करवा ली थी।

पूरी लिस्ट को दुकान मालिक को पकड़ा कर सारा सामान पैक करवा लिया। खरीददारी के उपरान्त बद्री धाम दर्शन करने का कार्यक्रम बन गया। सभी लोग दर्शन हेतु निकल पड़े। सुमित और मैं सुबह से नहाए भी नहीं थे, इसलिए हम दोनों ने तप्त कुण्ड में स्नान करने का फैसला कर लिया। तप्त कुण्ड में नहाने के लिए जैसे ही पानी में हाथ डाला इतना अधिक गर्म था कि डुबकी मारने का निर्णय तुरन्त मस्तिष्क से हटाना पड़ा। जग से पानी लेकर नहाना पड़ा।

सांयकालीन आरती काफी पहले हो चुकी थी इसलिए दर्शन हेतु लम्बी लाइन लगाने से बच गए। मुख्य द्वार से होकर दर्शन के लिए गए लेकिन मन्दिर समिति के कार्यकर्ताओं ने जल्दी-जल्दी के चक्कर में अच्छे से दर्शन नहीं करने दिए। असल में मेरा दर्शन करने का मुख्य उद्देश्य धार्मिक भाव कम और इतिहासिक दृष्टि से मूर्ति, और मन्दिर निर्माण में हुई कलाकारी को देखना ज्यादा होता है।

श्री बद्री विशाल की महिमा तो सभी ने कई बार सुनी और पढ़ी होगी इसलिए उसका जिक्र नहीं कर रहा। जब एक द्वार से अच्छे से दर्शन नहीं हुए तो सुमित और मैं दूसरी ओर से फिर से लाइन में लग गए। सोच लिया था जब तक तसल्ली नहीं हो जायेगी तब तक दर्शन के लिए बार-बार लाइन में लगता रहूँगा। लेकिन तीसरी बार लगने की बारी नहीं आयी। दो बार में ही काम हो गया।

दर्शनोपरान्त मन्दिर परिसर में घूमते हुए पौराणिक मूर्तियों को देखते हुए वापिस अपने रात्रि निवास पर आ गए। वापिस आकर मालूम पड़ा कि उधमपुर से आये वरिष्ट घुमक्कड रमेश शर्मा जी और दिल्ली से आए भाई सचिन त्यागी कल प्रातः वापिस जा रहे हैं। कारण जानने के लिए रमेश भाई जी से बात की तो वो हौसला नहीं बना पा रहे थे।

मैंने और सभी अनुभवी मित्रों ने उनको कहा भी कि आप ये ट्रैक कर सकते हैं, फिर भी उनका हौसला नहीं बन पाया। असल में ट्रैकिंग में शारिरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक क्षमता की भी कड़ी परीक्षा होती है। हिमालय को लांघने जाएंगे तो शरीर तो निश्चित रूप से थकता ही है। लेकिन अगर हम मानसिक रूप से थक गए और हौसला टूट गया तो मुसीबत आनी ही आनी है। यही बात मुझे लगी और इसीलिए मैंने रमेश भाई जी से साथ चलने की जिद भी नहीं की।

सचिन त्यागी भाई के परिवार में किसी की तबीयत ख़राब हो गई इसलिए उनको वापिस लौटना पड़ा। दोनों मित्रों का ऐसे वापिस चले जाना मुझे दुखी सा कर रहा था। रमेश भाई जी उधमपुर से आए थे, ट्रैक से पूर्व काफी उत्साहित भी थे। और सचिन भाई भी बहुत पहले से इस ट्रैक की तैयारी कर रहे थे। ट्रैक से संभन्दित जानकारी और बातचीत लगातार हम दोनों के बीच होती रहती थी। खैर, इस यात्रा में नहीं तो फिर कभी साथ चल पड़ेंगे, यही सोचकर इन दोनों मित्रों के निर्णय को स्वीकार करना पड़ा।

पहले हम कुल ग्यारह मित्र सतोपन्थ साथ जा रहे थे, अब नौ लोग ही कल से अपनी यात्रा शुरू करेंगे। इस पूरे ट्रैक पर कहीं भी रहने खाने की व्यवस्था नहीं है और चूँकि ये पूरा ग्लेशियर क्षेत्र है, इसलिए इस ट्रैक पर घोड़े-खच्चर नहीं चलते। राशन, टेण्ट, स्लीपिंग बैग, स्टोव, मिटटी का तेल इत्यादि सभी सामान की व्यवस्था बद्रीनाथ से ही किराये पर कर ली गयी, इन सभी सामान को ले जाने के लिए पाँच पोर्टर भी साथ चलेंगे। कुल मिलकर चौदह लोगों की अच्छी खासी बारात बन गयी। रात को खूब हंसी मजाक के बाद इस उत्सुकता से सो गए कि कल से उस रास्ते पर चलना है जिस पर पाण्डवों ने अपनी अन्तिम यात्रा की थी।

इस यात्रा में साथ चलने वाले सभी मित्रों के नाम इस प्रकार हैं। अमित तिवारी, संदीप पंवार "जाट देवता", योगी सारस्वत, सुशील कुमार "कैलाशी", संजीव त्यागी, सुमित नौडियाल, कमल कुमार सिंह "नारद" और विकास नारायण श्रीवास्तव।

सतोपन्थ ट्रैक एक कठिन ट्रैक में माना जाता है, इसलिए यात्रा वृतान्त के साथ-साथ इसके भूगोलिक स्वरुप को जानना भी जरुरी है। जैसे-जैसे वृतान्त छपता जाएगा, इसके भूगोलिक स्वरुप के बारे में भी जानकारी देता जाऊंगा। क्योंकि इस ट्रैक पर अधिकतम समय ग्लेशियरों के ऊपर ही चलना होता है, इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से इस जानकारी का होना भी अत्यावश्यक है।

क्रमशः....

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वसुधारा

जय बद्री विशाल

रात्रि के समय


बद्रीनाथ से नज़ारे













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20 comments:

  1. agali post ki intazar mei ......

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    1. धन्यवाद महेश जी।

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  2. बहुत बढ़िया बीनू भाई ��
    यात्रा बिल्कुल सही जा रही है।
    रोचक भी और रोमाँचक भी!
    अगले भाग की प्रतीक्षा में....

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  3. ट्रेकिंग के लिए शारीरिक सक्षमता के साथ मानसिक बल की भरपूर आवश्यकता होती है। मन, शरीर की क्षमता को तौल कर स्वयं निर्णय करता है इसलिए जो मन कहे वही करना चाहिए। बढ़िया यात्रा लेख।

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    1. सत्य वचन ललित सर। धन्यवाद।

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  4. बीनू भाई सब किस्मत का खेल है, सतोपंथ के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से तैयार था, ट्रैकिंग के लिए घर से निकल भी पडा, पर आखिरी वक्त पर आप लोगो के संग ना जा सका, इसका मुझे बहुत दुख भी हुआ,लेकिन कभी आगे यह ट्रैक जरूर करूगा यह बात मन को समझा कर मै बद्रीनाथ से लौट आया।
    बाकी आपकी यात्रा बहुत अच्छी चल रही है। आगे की पोस्ट का इंतजार रहेगा।

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    1. बिल्कुल सचिन भाई, फिर कभी निकल पड़ेंगे किसी यात्रा पर। धन्यवाद।

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  5. शानदार यात्रा वृतांत बीनू भाई ! बद्रीनाथ कितना सुन्दर लग रहा है रात में !!

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    1. धन्यवाद योगी भाई।

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  6. फ़ोटो जबरदस्त लग रहे हैं।

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  7. सुन्दर वृतांत...👍
    वैसे बीनू भाई हाल बुरा उन बहनो की माँ का जयादा था तो मदद पहले माता जी की करनी थी ।

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    1. जी डॉक्टर साहब, माताजी के साथ एक असिस्टेंट पहले से सहयोग कर रहा था।

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  8. बीनू भाई , आपकी यह सीरीज भी पिछली सीरीज की तरह शानदार जा रही है.

    आपकी पूरा ब्लॉग पढ़ डाला पिछले कुछ हफ्तों में, और आपके फेसबुक पोस्ट्स / कमेंट्स भी पढता रहता हूँ. We've few common friends like Vipin Gaur and Manu Tyagi.

    इतना कुछ जानने के बाद आप भी बिलकुल करीबी दोस्त लगते है :-)

    आप सब का जज़्बा और जोश देख कर मन करता है आप के साथ किसी यात्रा पर जाया जाये.

    Hopefully wil meet you and others some day.
    Thanks once again for wonderful posts.
    Keep travelling and keep sharing.

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    1. जरूर भाई। धन्यवाद।

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  9. सुखद साथ और खूबसूरत ....हम्म्म्म्म

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  10. Another interesting post with great photos. Surprised to read about Ramesh ji giving up already. Itni door se aakar bilkul trek ke pehle mana kar diya. But you are right about mental strength and determination.

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  11. जी वो हौसला नहीं जुटा पाए।

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