Thursday, 19 January 2017

कल्पेश्वर-रुद्रनाथ यात्रा (तीसरा दिन)- चल मेरे यार, चढ़ जा पनार

कल्पेश्वर-रुद्रनाथ यात्रा (तीसरा दिन)- दुमुक से पनार बुग्याल
इस यात्रा वृतान्त को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.
   
रात को थकान के कारण अच्छी नींद आयी। चढ़ाई के हिसाब से आज का दिन पूरे ट्रैक का कठिनतम दिन होने वाला था। करीब बारह किलोमीटर का ट्रैक है, जिसमें दस किलोमीटर चढ़ाई मिलने वाली है सुबह सभी जल्दी उठ कर तैयार हो गए। रात को ही नाश्ता और दिन के पैक्ड भोजन के लिए बात हो गयी थी। नाश्ता करके दुमुक गाँव के वजीर का मन्दिर देखने गए, छोठा सा मन्दि है, जिसका इस गाँव के सामजिक जीवन पर भरपूर असर है। 


मन्दिर देखकर वापिस आए तो होम स्टे का हिसाब चुकता करना था। सुविधाओं के हिसाब से घर के मालिक ने अत्यधिक पैसे लिए। और जरुरी सुविधाएं भी ना-मात्र की ही उपलब्ध करवाई। दुमुक से ठीक सामने वाले पहाड़ की चोटी पर बुग्याल साफ़ नजर रहे थे। अनुमान लग जाता है कि वहीँ चढ़ना है। शुरुआत अच्छी-खासी उतराई से हुई। करीब दो किलोमीटर नीचे मैना गाड़ नदी तक लगातार उतरना है। जहाँ दुमुक २४०० मीटर की ऊंचाई पर है वहीँ मैना गाड़ १९०० मीटर। दो किलोमीटर में ५०० मीटर नीचे को भयंकर वाली उतराई का दर्जा दे सकते हैं। मैना गाड़ उतरने में ही डेढ़ घण्टा लग गया। रास्ते में दो स्थानीय महिलाएं मिली, वो एक भैंस को पनार बुग्याल छोड़ने जा रही थी। हमको साथ-साथ चलने को जैसे ही उन्होंने कहा, हाथ जोड़ लिए। मैना गाड पहुंचकर डुबकी मारने का मन किया तो महेश जी को छोड़कर सभी नदी में कूद पड़े। काफी देर तक पानी से अठखेलियां करने के उपरान्त बारी थी पनार फतह करने की। डोभाल ने तुरन्त आज का स्लोगन दे दिया "चल मेरे यार, चढ़ जा पनार"

मैना गाड़ (छोठी नदी को गढ़वाली में गाड़ कहते हैं) से घनघोर जंगल के बीच से चढ़ाई शुरू हो जाती है। करीब आधा किलोमीटर चढ़ने के बाद छोठा सा बुग्याल आता है। मस्ती में सभी चढ़े जा रहे थे। महेश जी आज पानी बचा-बचा कर पी रहे थे। ये बात जब उन्होंने मुझे बताई, तो उनको निश्चिन्त किया कि आप खूब पानी पीजिये। हम बुग्यालों की ओर चढ़ रहे हैं, पानी की कमी नहीं होगी। आज का हमारा पहला पड़ाव था तोली ताल, सभी गप्पें मारते और मस्ती करते हुए चढ़े जा रहे थे। वन-सम्पदा की उर्गम घाटी में भरमार है, ये देखकर ख़ुशी हुयी कि इस वर्ष उत्तराखण्ड के जंगलों में लगी भीषण आग से ये क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित बचा रहा। हरियाली चारों ओर बिखरी पड़ी थी। पक्षियों की चहचहाने की मधुर ध्वनि से कानों को बड़ा सुकून मिल रहा था। अन्यथा दिल्ली जैसे महानगरों में दिन भर हार्न की ही आवाजें सुनने को मिलती हैं। कुछ आगे बढे तो जंगल से काखड (हिरन की प्रजाति) की आवाज सुनाई दी। मैंने सभी को इस बारे में बताया कि निश्चिन्त होकर चलो, काखड इस क्षेत्र में घूम रहा है, इसका अर्थ है कि आस-पास कोई शिकारी जानवर नहीं है।

दुमुक से निकले चार घण्टे से भी ज्यादा हो गए थे, सुबह नाश्ता भी भरपेट नहीं खाया था। भूख सभी को लगने लगी थी, एक छोठे से बुग्याल में बैठकर बिस्कुट खाये गए, कुछ देर आराम किया और फिर आगे बढ़ चले। नाक की सीध में ही चढ़ते जाना था, रास्ता भटकने वाली कहीं स्तिथि अभी तक इस ट्रैक पर मुझे नजर नहीं आयी थी। लगातार एक घण्टा चढ़ते रहने के बाद तोली ताल पहुँच गए। महेश जी सबसे पीछे चल रहे थे, जब वो तोली ताल से सौ मीटर नीचे थे तो मैंने ऊपर से आवाज लगाई कि जाओ आपको जादू दिखाता हूँ। बेहद खूबसूरत तोली ताल सामने था। वृत्ताकार रूप में फैला ये ताल और चारों ओर बुग्याल का मैदान, ऐसा लगता है, जैसे जंगलो को बीच में से हटाकर बुग्याल की खेती की गयी हो। 

तोली ताल में पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नहीं है, बारिश का पानी बुग्यालों से रिसकर निचले भाग में जमा हो जाता है, जिससे यहाँ पर ताल का निर्माण हो गया है। काफी जानवर यहाँ चरते हुए नजर आये। हम सभी भी इस ताल के बुग्यालों में जूते उतारकर लेट गए। गुनगुनी धूप में बुग्यालों में लेटे रहने का भी अलग ही आनन्द है।

तोली ताल में करीब एक घण्टे तक आराम करने के बाद आगे बढ़ने की तैयारी शुरू की। ऊपर चोटी पर काले बादल भी मंडराने लगे थे, बारिश की आशंका के चलते तेज कदमों से ताल के बीच से ही आगे बढे तो पाया कि पूरे ताल में जगह-जगह जानवरों की हड्डियां बिखरी पड़ी हैं। करीब तीस-चालीस जानवर अभी चर भी रहे थे। फिर कुछ जानवरों की हालत देखकर समझ आया कि स्थानीय निवासी बूढ़े हो चुके जानवरों को यहाँ लाकर छोड़ देते हैं। कुछ खुद मर जाते हैं, कुछ जंगली जानवरों का शिकार बन जाते हैं। यहीं ताल से कुछ ऊपर एक स्थानीय मंदिर भी है। एक वन विभाग का कमरा भी बना है, लेकिन उसकी हालत देख कर ये बात साफ़ समझ जाती है कि यह क्षेत्र पर्यटन के हिसाब से सरकारी उपेक्षा का जबरदस्त शिकार हुआ है। 

तोली ताल से आगे बढे तो सर के ऊपर काले बादलों ने डेरा डाल लिया। भूख भी लगने लगी थी, कहीं पानी का सोता मिलेगा तो वहां पर भोजन करेंगे यह सोच कर आगे बढ़ते रहे। करीब एक घण्टा चलने के बाद बारिश की हल्की-हल्की बूंदे गिरनी शुरू हो गयी, और पानी का सोता भी मिल गया। एक बड़ी सी चट्टान के नीचे आसरा ढून्ढ कर बैठ गए। भोजन भी खोल लिया, सोचा जब तक खाना खाएंगे, बारिश भी बन्द हो ही जाएगी।

भोजन किये आधा घण्टे से भी ऊपर हो गया, फिर भी बारिश बन्द नहीं हुई तो महेश जी और अमित भाई को आगे बढ़ने को कह दिया। असल में इन दो लोगों के पास बारिश से बचने के लिए पोंछो था। जबकि मैं, मिश्रा और डोभाल ऐसे ही मुहँ उठा कर ट्रैक पर गए थे। करीब दस मिनट बाद लगा कि बारिश हल्की हो गयी तो हम तीनो भी चट्टान की ओट से निकलकर आगे चल दिए। लेकिन इंद्र देव ने तो आज हमारी परीक्षा लेने का पूरा मन बना रखा था। तेज बारिश फिर से शुरू हो गयी। मेरे पास एक शॉल था उसी को ओढ़ लिया, मिश्रा जी ने गमछा और डोभाल ने मफलर ओढ़ लिया। अब ये सब कितनी देर तक हमको भीगने से बचा पाते। जैसे ही बारिश तेज होती हम किसी पेड़ या चट्टान की ओट ले लेते, कम हो जाती तो कुछ कदम आगे बढ़ जाते। चढ़ाई ने वैसे ही ख़त्म ना होने की कसम खा रखी थी। 

बारिश के साथ ऐसी लुका-छिपि खेलते हुए करीब दो घण्टे से आगे बढे जा रहे थे। जब महसूस हुआ कि अब बारिश जल्दी से बन्द नहीं होगी और लुका-छिपि से कोई हल नहीं निकलेगा इसलिए टक्कर लेने में ही भलाई है। मैदान में कूद पड़े और बारिश में भीगते हुए चढ़ने लगे। महेश जी सबसे पीछे छूट रहे थे, मुझे मजबूरी में उनके साथ-साथ चलना पड़ रहा था। अमित भाई, डोभाल और मिश्रा जी बिना रुके आगे निकल गये। डोभाल को एक टूटा छाता मिल गया था, कोई फेंक कर चला गया होगा। उस छाते की सबसे बड़ी खासियत ये थी कि उसके बीचों बीच एक बड़ा सा छेद था। महेश जी आज फिर से पस्त होने लगे थे। कुछ उनका जूता भी गीली जमीन पर अच्छे से ग्रिप नहीं बना पा रहा था, जिससे फिसलकर सीधे कई मीटर नीचे लुढ़कने का खतरा बराबर बना हुआ था।


पनार बुग्याल पहुँचने के लिए आखिरी आधा किलोमीटर सीधे चढ़ना पड़ता है, जो तोड़ कर रख देता है। मैं महेश जी का हौसला बढ़ाते-बढ़ाते उनसे कुछ आगे चलता जा रहा था। जैसे ही सौ मीटर आगे आता, रुककर उनकी प्रतीक्षा करनी पड़ती। आखिरी में जब बुग्याल क्षेत्र में प्रवेश किया तो लगा पहुँच गये हैं। एक धार दिख रही थी जो पहाड़ का उच्चतम स्थान सा प्रतीत हो रहा था। महेश जी ने मुझसे पूछाकि अब और कितना चलना होगा ? मैं खुद यहाँ पहली बार आया था, फिर भी कह दिया कि जो धार सामने दिख रही है इसके बाद होना चाहिए। तेज कदमों से जब मैं धार तक पहुंचा तो आधा किलोमीटर दूर गुज्जरों की भेड़ें बुग्यालों में चरती नजर आयी। लगा कि पहुँच गए।


बारिश भी हल्की हो चुकी थी लेकिन बर्फीली हवा सीधे शरीर को चुभ रही थी। महेश जी को आवाज लगाकर बताया कि शायद पहुँच गए हैं। ये झोपडी जो दिख रही थी ये मुख्य रास्ते से कुछ नीचे थी, बुग्यालों में वैसे रास्ता बनाने की जरुरत नहीं  होती, जिधर से नजदीक लगे वहीँ से निकल पड़ो। मैंने भी मुख्य रास्ते को छोड़कर जैसे ही झोपडी की ओर बढ़ना शुरू किया, वहीं से एक गुर्जर भाई ने आवाज लगाई कि ऊपर को जाओ। उसको जब ये पूछा कि अभी कितना आगे जाना है तो जबाब मिला आधा किलोमीटर आगे ठिकाना है। निराश होकर वापिस मुख्य रास्ते पर कर आगे बढ़ना शुरू कर दिया। कुछ आगे बढ़ा ही था कि गुर्जरों के चार कुत्तों ने भोंकते हुए मेरी ओर दौड़ना शुरू कर दिया। ये कुत्ते इतने खतरनाक होते हैं कि मजाल क्या है बाघ या कोई जंगली जानवर इनके रहते भेड़ों पर हमला कर दे। मैं एक जगह पर चुपचाप खड़ा हो गया, चारों कुत्ते आए और सूँघकर आगे बढ़ गए। इतने में उनको दूर से ही महेश जी की आहट मिली तो उनकी ओर दौड़ पड़े। 

मुझे तो इन कुत्तों के चाल-चलन का अनुभव था, कहीं महेश जी डर ना जाएँ, इसलिए जल्दी से कुछ कदम वापिस लौटना पड़ा। जिसका डर था वही हुआ, महेश जी मेरे को आवाज़ें लगा रहे थे। उनको जोर से आवाज लगाकर बताया कि चुपचाप खड़े रहो ये सूंघ कर खुद ही लौट जाएंगे। कुत्तों के जाने के बाद सीधा रास्ता दिखाई दे रहा था, और ठिकाना भी। तेज क़दमों से आगे बढ़ गया, बारिश लगातार हुए ही जा रही थी। जब ठिकाने पर पहुंचा तो लगा बड़ी राहत मिलेगी, लेकिन इम्तेहान तो अभी और भी थे। अमित भाई ढाबे के किचन में बैठे मिले, मुझे देखते ही बोले कि कमरे में जाकर चेंज कर लो। ये सुनते ही बड़ी ख़ुशी हुई। मैंने पूछा हमारा कमरा कौन सा है ? बोले आखिरी वाले दरवाजे से अन्दर चले जाओ, सीढियां मिलेंगी फर्स्ट फ्लोर पर हमारा कमरा है, डोभाल वहीँ है, बाहर से आवाज लगा लेना। दिमाग तो खटका कि झोपड़ियों में कब से ये फ्लोर सिस्टम होने लगा ? चलो कोई बात नहीं, कमरे में चले जाता हूँ। 

दरवाजे के बाहर से डोभाल को आवाज लगाई तो उसने भी ऊपर से जबाब दिया कि हाँ सीढ़ियों से ऊपर जा। पहले तो सीढ़ियों की हालत देख कर ही शंका हुई, लकड़ी की बनी हुई थी। फिर ऊपर चढ़ा तो कमरे की रौनक देख कर मुहँ से एक भी बोल नहीं फूटा। चुपचाप रेंगकर ऊपर पहुँचा, गीले कपडे फेंकेऔर कम्बल में दुबक गया। असल में जो हमको कमरा मिला था वो झोपडी में ऊपर की तरफ सामान या लकड़ियों को रखने की जगह होती है। आज दिन भर बारिश की वजह से कोई ग्रुप यहाँ से आगे नहीं बढ़ पाया। ऊपर से हम पांच और एक ग्रुप हमसे पहले यहाँ पहुँच गया। भीड़ इतनी हो गई कि जगह बची नहीं। ढाबे वाले ने जब पूछा कि यहाँ सो सकते हो तो डोभाल और अमित भाई ने तुरन्त हाँ कह दी।

कुछ देर बाद महेश जी भी मुझे आवाज़ें लगाते-लगाते पहुँच गए। उनका भी स्वागत किया तो उनके मुहँ से भी कोई बोल नहीं फूटा। चुपचाप रेंगकर वो भी ऊपर चढ़े और कम्बल में दुबक गए। बाहर तूफानी हवा और बारिश अभी भी जारी थी। मिश्रा जी से विनती की तो वो हिम्मत करके नीचे उतरे और हमारे लिए दो चाय ले आए। आज यहाँ पनार में बिस्तरों की भी सख्त कमी थी। हम पांच लोगों को ओढ़ने-बिछाने के लिए कुल पांच कम्बल और एक रजाई मिली हुई थी। सोने की जगह इतनी कि तीन भी जाएँ तो गनीमत होगी। ऊपर से बर्फीली हवा, और बारिश। जैसे-तैसे करके हम पाँचों घुस गए। 

करीब एक घण्टे बाद ढाबे वाले ने खाना खाने के लिए आवाज लगाई तो उसको कह दिया कि यहीं पर पहुंचा सकते हो तो ठीक है, अन्यथा बाहर आने की हिम्मत नहीं बची। ढाबे वाले ने चावल का पतीला, दाल का कुकर, सब्जी की कढ़ाई और रोटी वहीँ पहुंचा दी। ठेठ जंगली स्टाइल में भोजन किया औ बर्तन खिसका के कोने में रख दिएअब एक और परेशानी थी कि सोने से पूर्व टॉयलेट कैसे जाया जाए। एक बार तो मन किया कि यहीं कोने में कर दूँ, लेकिन यहाँ पर रात हमको ही गुजारनी थी। प्रभु का नाम लिया और हिम्मत करके निपट ही आया। इसके बाद ऐसा प्रण करके दुबका कि सुबह से पहले नीचे उतरने की नौबत नहीं आई।

आज का दिन चढ़ाई के मामले में कठिनतम रहा जहाँ दुमुक से शुरू के दो किलोमीटर में सीधे ५०० मीटर नीचे उतरकर मैना गाड़ पहुंचे थे, वहीँ मैना गाड़ (१९०० मीटर) से तोली ताल (२६४० मीटर) और फिर पनार बुग्याल (३५०० मीटर) पहुँचे। कुल मिलकर दस किलोमीटर में १६०० मीटर ऊपर चढे। जो कि बहुत ही ज्यादा मानी जा सकती है। कल से चढ़ाई के हिसाब से आसान दिन मिलने वाले हैं, इसी से संतोष कर जैसे-तैसे सोने का प्रयास करने लगे।

क्रमशः.....

इस यात्रा वृतान्त के अगले भाग को पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.




दुमुक में इसी घर में रुके थे

कंडी

दुमुक

दुमुक




सर्दियों के लिए पालतू जानवरों का बिस्तर का जुगाड़

स्थानीय देवता का मन्दिर

दुमुक



गढ़वाली में इसको कहते हैं "दें लगाना"


दुमुक होम स्टे के मालिक

मैना गाड़

मैना गाड़ की उतराई

पनार के जंगल

मैना गाड़ पुल

मैना गाड़ 

मैना गाड़ पुल


मैना गाड़ में डुबकी का आनन्द

मैना गाड़ में डुबकी का आनन्द


जहाँ पानी मिले भर लो

ओ दूर महेश जी


चल मेरे यार, चढ़ जा पनार


चढ़े चलो




पहुँच गए "तोली ताल"

अमित तिवारी

बुग्यालों में लेटने का आनन्द

तोली ताल


बाघ का बचा खुचा भोजन

सूरज मिश्रा

तोली ताल देवता मन्दिर


तोली ताल से आगे

पनार में फाइव स्टार कमरा

पनार में फाइव स्टार कमरा

इस यात्रा के सभी वृतान्त निम्न हैं:-




22 comments:

  1. Hi Ramta jogi

    It's delighted to read this description in a post although most of us are known to all this earlier too.
    But you have a great writing skill and you use it beautifully while describing all the necessary details about the journey towards the Panar. It's delightful to read how you Incorporated your friends in this story.
    All in all a good post with beautiful pics of beauty of the Himalaya.
    Keep it up!
    Thanx for sharing!

    ReplyDelete
  2. दुमुक, बुग्याल और पनार
    इनको पार करते दोस्त चार
    चढ़ाई मुश्किल,और पानी की धार
    जिंदाबाद, जबरदस्त और शानदार

    ReplyDelete
    Replies
    1. हा हा हा...शानदार.
      धन्यवाद मुकेश जी.

      Delete
  3. ग़ज़ब यात्रा रही होगी भाई ये तो। महेश जी ने भी बहुत हौंसला दिखाया। फाइव स्टार रूम शानदार था। अब आगे क्या हुआ इसका इंतजार है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी महेश जी का हौसला काबिले तारीफ रहा. बुरी तरह थक गए थे लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी.

      Delete
  4. Nice post with lot of beautiful pictures.

    ReplyDelete
  5. जब पनार बुग्याल की धार पर था समुद्रतल से उचाई कुछ 3300 मीटर के आसपास थी,मैं पूरी तरह भीग चूका था, ऐसी ठण्ड आज तक मुझे कभी नहीं लगी, एक समय तो लगा की निपट जाऊंगा पर बाबा बियर ग्रिल्स के सर्वाइवल शो की जय हो सारे भीगे कपडे उतारे सूखे पहने फिर हलकी बरसात में ही 30 पुश अप मारे, तब जाके सांसे और हाथ-पांव गर्म हुए। दूरी की जानकारी, बरसात में भीग जाना और रुकने की सही स्थिति पता न होने के कारण का अंत के 1 km बहुत ही बोझिल हो गए थे मेरे लिए :) पर सुबह सो के उठा तो चमत्कार ही हो गया :D

    ReplyDelete
    Replies
    1. पनार में अकेले तुम ही थे जो बार बार बाहर निकलने की हिम्मत भी कर पा रहे थे. अपने तो बस की नहीं थी उस बर्फीले तूफ़ान में बाहर निकलने की.

      Delete
  6. जबरदस्त पोस्ट है भाई पढ़ कर मजा आ रहा है, लग रहा है जैसे हम भी यात्रा में आप के संग हो। अगले भाग का इंतजार रहेगा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद सचिन भाई.

      Delete
  7. शानदार ट्रेकिंग वर्णन बीनू भाई । ईमानदारी से हिसाब दिया पूरे ट्रेकिंग का । मुझे तो कुछ कठीन ही लग रहा है ट्रेक । वैसे आज तक कोई ट्रेक नही किया हमने। ,😁😀

    लेख ने वही होने का वास्तविक अहसास भी करा दिया ।
    बढ़िया विवरण और शानदार चित्र ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी कठिन तो है, लेकिन बारिश और तूफ़ान ने और ज्यादा कठिन बना दिया था.

      Delete
  8. Fantastic account of a taxing day of trekking. Hope to meet and trek with you someday. Thank you.

    ReplyDelete
  9. भाई पढ़ कर मज़ा आ गया। ऐसा लगा जैसे मैं भी साथ था।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद प्रवीण जी.

      Delete
  10. पनार तो बहुत ही खूबसूरत है और मैना गाढ़ उससे भी ज्यादा ! वृतांत बढ़िया चल रहा है

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद योगी भाई

      Delete
  11. बहुत ही शानदार वृतांत, फोटोग्राफी व खूबसूरत नज़ारे।

    मज़ा आ गया।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद संदीप जी

      Delete